(तदवीर no 1 हुस्ने नियत पैदा कीजिये!)

 

मोमिन कि नियत का मक़ाम 

नवी अलैहिस्सलातो वस्सलाम का इरशादे गिरामी है!

    (इन्नमल आमालू बिन नियती)

 आमाल का दारोमदार नियतो पर है! 

एक दूसरी हदीस पाक मै फ़रमाया     

(नियहुलमुमिनी ख़ईरम मिन अमालिही)

मोमिन कि नियत इसके अमल से भी ज्यादा अच्छी होती है! 

तालिबे इल्म को ये बात समझने मै जरा मुश्किल पेश आती है! मगर हकीकत यही है! कि नियत अमल से ज्यादा बेहतर होती है! उलमा ने इसकी कई बुजुहात लिखी है! 

(1) सबसे पहली बात तो ये है कि नियत करने से मोमिन को अज्र मिलता है! और इसकी नेकी लिखी जाती है! भले बाद मै इसके अमल मै रिया निकले या किसे वजह से इसका अमल क़ुबूल न हो! लेकिन नियत के करने से इसी बख्त इसके नामाये आमाल मै नेकी लिख दी जाती है! 

(2) दूसरी वजह ये है! कि नियत के अंदर दवाम होता है! और अमल के अंदर दवाम नहीं होता कोई भी अमल करें! वो महदूद होगा लेकिन नियत कि कोई हद नहीं मिसाल के तोर पर एक आदमी ने ये नियत कर सकता है! कि जब तक मेरी जिंदगी है!

 मै तहज़जूद कि नमाज़ पढ़ूंगा! अगर उसकी जिंदगी सो साल हो तो ये नियत सो साल तक ही होंगी और इससे भी ज्यादा है! तो नियत भी ज्यादा मुद्दत तक मुहीत हो जाएगी! इस दवाम कि वजह से नियत अमल से ज्यादा अफ़ज़ल होती है! 

(3) यहाँ एक नुकता समझने कि जरूरत है! इंसान जो भी आमाल करता है! वो महदूद होते है! लेकिन इसको इसके बदले मै जन्नत मिलेगी! इसमें वो हमेशा हमेशा रहेगा! इसी तरह इंसान जितने भी गुनाह करता है!

 वो महदूद होते है! लेकिन जहन्नुम का अज़ाब हमेशा हमेशा मिलता रहेगा! यानी काफिर ने कुफ्र तो महदूद उमर के लिए किया मगर हमेशा हमेशा अजाब मिलेगा उलमा ने इसकी यही वजह बताई कि अगर चे मोमिन महदूद अमल करता है! मगर उसकी नियत ये होती है!

 कि जब तक मेरी जिंदगी है! मै अपने परबर दिगार कि फरमा बरदारी करूँगा! इस लिए वो हमेशा हमेशा के लिए जन्नत मै रहेगा! और काफ़िर कि नियत ये होती है!

 मै अल्लाह को नहीं मानता या फिर इसके साथ किसी को शरीक बना दिया! इस नियत कि वजह से इसको हमेशा हमेशा के लिए जहन्नुम का अजाब दिया जायेगा! 

(4) इसकी तीसरी वजह ये है! कि नियत कल्ब का अमल है! इस कल्ब को पूरे जिस्म मै फजीलत का मुकाम हासिल है! कियु कि वहां पर इंसान को मार्फ़त हासिल होती है!

 लिहाजा कल्ब का अमल वाकी तमाम जिस्म के आअजा के अमल पर फज़ीलत रखता है! इस लिए हमेशा अपनी नियतो को टतोलते रहना चाहिए!

 इनकी निगरानी करते रहना चाहिए! कि हम जो काम कर रहे है! किया वो वाकई वो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के रजा के लिए कर रहे है! या इसमें कोई कोई और मकसद भी है! 

   

नियत कि खराबी कि वजह से पहाढ़ो जैसे बढे अमल क़यामत के दिन (हवाअम मंसूरन) बना दिए जायेंगे! और वो छोटे छोटे अमल जिनको इंसान करके भूल जाता है! नियत के इखलास कि वजह से क़यामत के दिन इंसान कि बख्सिस का सबब बन जायेंगे! 

हदीस पाक मै आया है! कि एक बंदा क़यामत के दिन अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के हुज़ूर पेश किया जायेगा! इसके हक़ लेने बाले बहुत होंगे! जब इनको इनका हक़ दे दिया जायेगा! तो इस बन्दे के सारे अमल हि ख़तम हो जायेंगे!

 देखने बाले ये समझेंगे कि ये बंदा अब जरूर जहन्नुम मै जायेगा! मगर परबर दिगार फरमायेगा! इसके नामाये आमाल के सब आमाल अगर छे लोगो मै तकसीम हो गए! लेकिन ये भी लिखा हुआ है!

 इस बन्दे कि नियत सब के लिए हमेशा के लिए भलाई कि होती थी! इस बन्दे कि भलाई कि ये नियत पर मैंने इस बन्दे कि बख्सिस फरमा दी! 

       

एक रिबायत मै आया है! कि क़यामत के दिन एक बंदा पेश किया जायेगा! इसके नामाये आमाल मै मै हज का उमरे का और न मालूम कितनी सब बे दारियों का सबाब लिखा होगा! बो बढ़ा हैरान होगा! 

कि रब्बे करीम मैंने तो हज किया हि नहीं उमरा भी नहीं किया या इतने नहीं किये जितने लिखें हुए है! या मेरी उम्र तो कम थी! और हज्जो कि तादाद तो उससे भी ज्यादा है! 

इसके जवाब मै इसको कहा जायेगा! कि तुमने अमल थोड़ा हि किया था! लेकिन तुम्हारे दिल के अंदर हर साल अल्लाह के दर पर हाजरी देने कि नियत होती थी! हर रात मै तहज़जूद पढ़ने कि नियत होती थी! वो जो तुम कहते थे! 

ऐ काश अगर मेरे बश मै होता! अगर व साइल होते! अगर मेरी हालत मवाफिक होती तो मै हज और उमरा करता! 

वो जो तुम्हारे दिल से एक आरजू और तमन्ना उठ ती थी! उस तमन्ना के इखलास को देखते हुए हम इस अमल का सबाब तुम्हारे नामाये आमाल मै लिख दिया करते थे! 

             

इमाम अहमद बिन हम्बल का एक पढ़ोसी लोहार था! वो फोत हो गया! इसको किसी ने खुआब मै देखा और पुछा जी आगे किया बना कहने लगा! अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त कि रहमत हो गयी! और मुझे बख्स दिया गया! 

और मुझे इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह के दर्जे मै पहुंचा दिया गया! वो सुनकर बढ़ा हैरान हुआ इसके बाद इसकी आँख खुल गयी! खुआब देखने वाले खुद भी मुहद्दीस और आलिम थे! वो सोचने लगे! कि इसके अहले खाना से पूछना चाहिए!

कि इसका कोनसा ऐसा कोई ख़ास अमल है! जो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को पसंद आ गया! चुनानचे जब इन्होंने इसके अहले खाना से पुछा तो उन्होंने कहा कि जैसे एक आम मुसलमान कि जिंदगी होती है! ऐसे हि इनकी जिंदगी है! 

फिर उन्होंने बताया कि मै इस वजह से पूछ रहा हूँ! इनके अहले खाना ने इनको बताया! मैंने इन मै दो बाते बढ़ी अजीब देखि एक तो ये इनके दिल मै अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का अहतराम बहुत था! यहाँ तक कि जब ये लोहा कूट रहे होते थे! 

और हथोड़ा मारने के लिए सर से ऊपर उठाते अगर एन उस बख्त अज़ान कि आवाज अल्लाहु अकबर आती तो ये उसी बख्त हथोड़े को नीचे रख देते थे! कि अब मेरे परबर दिगार ने बुला लिया है! अब मै पहले इसका हुक्म पूरा करता हूँ! 

दूसरा ये कि जब ये थके हुए घर वापस आते थे! और रात को देखते थे! कि इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैहि अपनी छत के ऊपर इबादत करते है! तो ये हसरत और अफ़सोस के साथ सर्द आहे भरते थे!

 और कहते थे! मै किया करू मेरे बच्चे ज्यादा है! अगर मै काम नहीं करूँगा! तो इन बच्चों के लिए कैसे इंतज़ाम होगा! मेरी पीठ हलकी होती मुझ पर बच्चों का ये बोझ न होता और बख्त फारिग कर सकता तो मै भी इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैहि कि तरह राते गुज़ारता 

वो मुहद्दीस फरमाने लगे हा इनका ये अमल ऐसा था! कि इस के दिल के इखलास कि वजह से रब्बे करीम ने जन्नत मै ऐसे वही दर्जा अता फरमा दिया! जो इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैहि को अता फ़रमाया था! 

इससे पता चला कि इंसान एक अमल खुद तो नहीं कर सकता लेकिन इस अमल के करने कि तमन्ना तो दिल मै रख सकता है! न हम नेक तो नहीं बन सके मगर तमन्ना तो रख सकते है

 न हम सर से लेकर पाओ तक अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त कि सरियत के मुताबिक नहीं बन सके लेकिन तमन्ना तो रख सकते है! तो नियत कर लेने से बसा औकात इंसान को वो नेमते मिल जाती है! जो अमल पर भी इसको नहीं मिला करते! 

               

सदके दिल कि अलामत ये है! कि जो इंसान के बस मै हो! वो करले एक व वन्दा कहता है! कि जी मै ये चाहता हूँ! अब कैसे पता चले कि वो ठीक कह रहा है! या गलत तो सदके दिल कि ये अलामत लिखी गयी है! कि जितना उसके इख़्तियार मै है! 

अगर वो करलेगा तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उसे इसका भी अज्र अता फरमायेगा! जो इसके इख़्तियार से बहार होगा उसके लिए क़यामत के दिन कितने लोग ऐसे होंगे! जो दुनिया के अंदर बढे अमीर गुजरे होंगे!

 दुनिया के अंदर इनका सुमार अमरा मै होगा मगर क़यामत के दिन अल्लाह तआला इनको फुकरा मै सुमार फरमायेगा! और कितने लोग ऐसे होंगे!

 जो दुनिया मै नाने सवीणा को तरसते थे! फाकों मै जिंदगी गुज़ारते थे! मगर क़यामत के दिन कारूँन के साथ इनका हश्र कर दिया जायेगा! इसलिए कि इनके दिल कि वही नियत थी! मन हश्र है! 

अगर हमारे दिल मै ये नियत होंगी कि हम अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त कि मार्फ़त हासिल करना चाहते है! और इसकी मोहब्बत से अपने दिल को लबरेज करना चाहते है!

 तो एन मुमकिन है! तो इसी नियत को अल्लाह तआला क़ुबूल करके क़यामत के दिन अपने चाहने बालो कि जमाअत मै हमें शामिल फरमा ले! 

              

एक दफा का जिक्र है! कि मौलाना याहयाह नाहा रहे थे! और सागिर्द आपके जिस्म पर पानी डाल रहे थे! एक जाहिल वहां से गुजरा और कहा कि अरे ये मौलवी अपने लिए मसला जाइज़ कर लेते है! और हमारे लिए न जाइज़ हो जाता है! 

कई दफा इस तरह हुआ! एक दिन इस जाहिल ने पूछ लिया कि आज तो जरूर बता दे! फ़रमाया तू पाक होने या नहाने के लिए पानी बहायेगा! तो इजराफ हो सकता है! और मै ठंडक लेने के लिए इलाज कि नियत से ये पानी डलवाता हूँ! 

इसलिए जाइज़ है! मेरी ये नियत होती है! कि मै नहाऊंगा तो तबियत मै ताज़गी आ जाएगी! आज कल टोटीया और खुले पानी है! 

बचते बचते भी इजराफ होने का खतरा है! इस लिए हमें भी आज कल नहाते हुए इलाज कि नियत करनी चाहिए! नियत के बदलने और दुरुस्त करने से काम अच्छा हो जाता है! 

  (रूहानी तदावीर किताब)

हज़रत मौलाना पीर ज़ूलफिकार अहमद साहब नक्सबंदी 
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