अपने अंदर इखलास पैदा कीजिये!/Apne Andar Ikhlas Paida Kejeye Lyrics Bayan


 अपने अंदर इखलास पैदा कीजिये! 

दीन के तीन दर्जे! 

दीन के तीन दर्जे है! जिनको तय करके इंसान अल्लाह ताला का मुकरीब बंदा बनता है! 

(1) पहला दर्जा इल्म का हासिल करना है! इल्म एक नूर है! जिससे इंसान अपनी जिंदगी गुजारने कि रहमनुयाई हासिल करता है! 

अगर इल्म हि ना हो तो इंसान अमल कैसे कर सकता है! लिहाजा एक बुनियाद है! इस लिए नवी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया! 

(तलबुल इलमी फरीदाह अला कुल्ली मुस्लिमिउ व मुस्लिमतन)

इल्म का हासिल करना हर मुस्लमान मर्द और औरत पर फ़र्ज है! 

इस आयत का ये मतलब है! कि जरूरियाते दीन का इल्म हासिल करना तो हर एक पर लाजिम है! अलबत्ता इसकी तफसीलात का हासिल करना फरजे किफाया है! 

कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो इल्म कि तफसीलात को भी जानेंगे! एक ऐसी जमाअत हर ज़माने मै होनी चाहिए! रह गयी मेरे और आप जैसे अवाबुन्नास कि बात तो हमें जरूरियाते दीन का पता होना जरूरी है! याद रखे कि 

फ़र्ज का इल्म हासिल करना फ़र्ज है! 

वाज बात का इल्म हासिल करना वाजिब है!

 और सुनन का इल्म हासिल करना सुन्नत है! 

(2) दूसरा दर्जा इल्म पर अमल करने का है! कियु कि फकत इल्म हासिल करने से काम नहीं बनता अगर फकत इल्म पर मगफिरत होती तो शैतान कि मगफिरत हो चुकी होती इसके पास इल्म तो बहुत था! 

लेकिन अमल मै कोताहि कर गया! जो इंसान अपने इल्म पर अमल करता है! अल्लाह ताला उसको इल्मे लदून्नी अता फरमा देता है! 

(मन अमिला बिमा अलिमा वर रशाहुल लाहा इल्मा मालम यालम)

जो अपने इल्म पर अमल करता है! अल्लाह तआला उसे वो इल्म अता करता है! जो वो नहीं जानता

आम तोर पर शैतान तलवाअ के दिल मै ये बात डालता है! कि तुम अभी इल्म हासिल करलो फिर बाद मै इखट्टा अमल कर लेना जिसने ये बात सोचना शुरू करदी!

 वो शैतान के धोके मै आ गया! इसका एक हि तरीका है इधर पढ़ो और उधर अमल करो! यही सहाबाये किराम रजि अल्लाहो अनहो का खलक था! 

सय्यदना सिद्दीके अकबर  रजि अल्लाहो तआला अनहो फरमाते है! कि मैंने दो साल मै सुरये बकरा पढ़ी! लेकिन जब सुरये बकरा मुकम्मल हुयी! तो मेरा अमल भी सुरये बकरा के मुताबिक हो चूका था! 

(3) तीसरा दर्जा इखलास का है! यानी जो अमल भी करें! उसका मकसद अल्लाह तआला कि रजा का हो! ये सब से मुश्किल मरहला है! आमाल कर लेना आसान है!

 लेकिन इस माअयार के आमाल करना जो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को पसंद आ जाये! ये इंतिहाई मुश्किल काम है! इसी लिए अल्लाह बाले करते भी है! 

और डरते भी है! वो सारी उमर रात को तहाज़ज़ूद कि पाबंदी के साथ गुज़ारने के वाबजूद कहते है! 

(मा अबदनाका हक्का आवदतिका वमा अरफनाका हक्का फतिका)

वो सारी रात तहज़जूद कि नमाज़ पढ़ने मै गुज़ार देते थे! और फिर सुबह के बख्त इस पर इतने नादम होते थे! और इतना अस्तगफार करते थे! जैसे वो सारी रात किसी कवीरा गुनाह के मुरतकब हो रहे होते थे! 

(कानू कलीलम मीनल लइली मा याह जाऊन व बिल अशहारी हुम यसतगफिरून)

रात को कम सोया करते थे! और शहरी के बख्त मगफिरत माँगा करते थे! 

वो सब फिर अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के हुज़ूर अपनी जवीनी नियाज झुकाये रखते थे! और सुबह के बख्त हसरत करते थे! कि हम ऐसे अमल ना कर सके! जैसे हमें करने चाहिए थे! वल्कि किताबो मै तो यहाँ तक लिखा है!

 वो सुबह के बख्त उठ कर अपने चेहरे पर इस खौफ से हाथ लगा कर देखते थे! कि कही हमारी सक्ले तो मसख नहीं हो गयी! आज हम गुनाहो पर इतना खौफ जदा नहीं होते जितना हमारे अकाबीर अपनी नेकियों के रद हो जाने पर अल्लाह से खौफ जदा हुआ करते थे! 

  (रूहानी तदावीर किताब)

हज़रत मौलाना पीर ज़ूलफिकार अहमद साहब नक्सबंदी 
मौलाना मुहम्मद रुहुल्लाह नक्सबंदी गफूरी